





Sangharsh Apane Viruddh, संघर्ष अपने विरुद्ध by Acharya Prashant
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हमारा सारा जीवन संघर्ष में ही बीतता है. बचपन में माता पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने का संघर्ष, जवानी में नौकरी के लिए भाग दौड़ और वृद्धावस्था में अपनी देह को कुछ और वर्षों तक जीवित रखने की चाह. इन बाहरी चीज़ों में हम इतना खो जाते हैं कि अपने भीतर चल रहे द्वन्द को देख ही नहीं पाते. जीवन प्रतिपल संघर्ष तो है ही, पर हम यह नहीं जान पाते कि हमारे लिए कौनसा संघर्ष उचित है. और फिर हम छोटी लड़ाइयों में उलझकर बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई से चूक जाते हैं. बड़ी लड़ाई वो है जो अपने ख़िलाफ की जाती है, असली संघर्ष वो है जो मन के विकारों को हटाने के लिए किया जाता है. जैसे जैसे हमारा मन सुलझता जाता है, वैसे वैसे हम बाहरी चुनौतियों का सामना करने के लिए भी सक्षम होते जाते हैं. इस पुस्तक में हमें आचार्य प्रशांत से समझने को मिलेगा कि सही संघर्ष कौनसा है, वह क्यों ज़रूरी है और यह कि आनंद तो स्वयं से जूझने में ही है.
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हमारा सारा जीवन संघर्ष में ही बीतता है. बचपन में माता पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने का संघर्ष, जवानी में नौकरी के लिए भाग दौड़ और वृद्धावस्था में अपनी देह को कुछ और वर्षों तक जीवित रखने की चाह. इन बाहरी चीज़ों में हम इतना खो जाते हैं कि अपने भीतर चल रहे द्वन्द को देख ही नहीं पाते. जीवन प्रतिपल संघर्ष तो है ही, पर हम यह नहीं जान पाते कि हमारे लिए कौनसा संघर्ष उचित है. और फिर हम छोटी लड़ाइयों में उलझकर बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई से चूक जाते हैं. बड़ी लड़ाई वो है जो अपने ख़िलाफ की जाती है, असली संघर्ष वो है जो मन के विकारों को हटाने के लिए किया जाता है. जैसे जैसे हमारा मन सुलझता जाता है, वैसे वैसे हम बाहरी चुनौतियों का सामना करने के लिए भी सक्षम होते जाते हैं. इस पुस्तक में हमें आचार्य प्रशांत से समझने को मिलेगा कि सही संघर्ष कौनसा है, वह क्यों ज़रूरी है और यह कि आनंद तो स्वयं से जूझने में ही है.


